Monday, May 11, 2009

चौथे चरण के मतदान के बाद सरकार बनाने के जुगाड़ पर मशक्कत

ईश्वर की असीम अनुकम्पा के परिणाम स्वरुप चौथे चरण के मतदान में पिछले तीनों चरणों की तुलना में अधिक मतदान हुआ ,जिसमे पश्चिम बंगाल,पंजाब और हरियाणा की जनता का योगदान दिखाई देता है ,अन्यथा उत्तर प्रदेश,बिहार की जनता ने तो पिछले चरणों के अनुरूप ही कम मतदान में भाग लियाअब केवल अन्तिम चरण का मतदान १३ अप्रैल को तमिलनाडु,उत्तराँचल,उत्तर प्रदेश,और हिमांचलप्रदेश में होना है, इनमें तमिलनाडु की सभी सीटों पर मतदान होना बहुत महत्वपूर्ण है,पिछले चुनावों में तमिलनाडु ने पूरी तरह यूपी० का साथ दिया था किंतु इस चुनाव में तमिलनाडु में चुनावी मुद्दा श्रीलंका में तमिल वासियों के साथ श्रीलंका की सेना द्वारा तथा कथित अत्याचार है,श्रीलंका में लिट्टे के प्रभाकरन के विरुद्ध कार्यवाही के कारण तमिलों की बड़ी संख्या में मारे जाने के बाद तमिलनाडु में जनमत श्रीलंका के सिंघलीयों के विरुद्ध बन गया है,सुश्री जयललिता ने श्रीलंका में तमिल ईलम की मांग की है जिसके पक्ष में जनमत बनता दिखाई दे रहा है। अब देखना यह है की श्रीलंका का मसला तमिलनाडु के चुनाव को कितना प्रभावित करता है
इधर अन्तिम चरण के मतदान के पहले कांग्रेस पार्टी के महासचिव श्री राहुल गाँधी ने दिल्ली में पत्रकार सम्मलेन में चुनाव के बाद सरकार बनने की कवायद शुरू करते हुए अपने गठबंधन के साझीदारों को छोड़ते हुए जनतादल(यूं),अन्ना डी०एम के० तथा लेफ्ट पार्टियों को जोड़ने की बात कहकर राजनीतिक फिजा को गरम कर दिया तो दूसरी तरफ़ कल लुधियाना में एन०डी०ए की विशाल रैली में टीआरएस के नेता श्री चन्द्रशेखर राव ने शामिल होकर अपने आप को तीसरे मोर्चे से अलग करते हुए एन डी में सम्मिलित होने की घोषणा कर डालीइस समय अख़बारों,न्यूज चैनलों पर १६ तारिख को होने वाली मत गणना पर कयास लगाने का काम चलने लगा ,ऐसा लगता है की निर्वाचन आयोग ने अब आचार संहिता हटा ली है जिसके कारण हर चैनल पर कोई कोई पैनल सीटों की गणना कर रहा है और उनके द्वारा कराये सर्वे का जिक्र कर रहा है जिसे चुनाव के पहले आयोग ने रोक लगाने की बात कही थीकल "टाइम्स नाउ" चैनल पर एक चर्चा श्री अर्नब गोस्वामी द्वारा प्रस्तुत की गई थी जिसमे चर्चा के लिए जिन आंकडों को आधार बना कर चर्चा चल रही थी वह आंकडा टाइम्स आफ इंडिया द्वारा तीन- चार दिन पहले अखबार में छापा गया थाइससे सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है की चुनाव आयोग के निर्देशों का या तो उल्लंघन इन मीडिया वालों द्वारा किया जा रहा है या फिर श्री नवीन चावला के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद आचार संहिता शिथिल कर दिया गया है और केवल सरकार के चहेतों के काम अंजाम दिए जारहे है ,जैसा की आपने देखा की बिहार में दस दिन चुनाव हो जाने के बाद केन्द्रीय चुनाव आयोग ने जांच कराने का काम किया। जो चुनाव आयोग के बदले रुख का परिचायक है। मेरी राय में मीडिया द्वारा अनुमान लगना कोई अनुचित कार्य नही है किंतु इससे जनमत प्रभावित भी नहीं होना चाहिए । अब चर्चा चल ही रही है तो मैं अपना अनुमान भी यहाँ व्यक्त करना उचित समझता हूँ । मेरी गणना के अनुसार कांग्रेस और उनके गठबंधन के पास १९७ और भारतीय जनता पार्टी और गठबंधन के पास २०१ सीट तीसरे मोर्चे को ११५ तथा श्री मुलायम सिंह यादव ,लालू यादव और श्री राम विलास पासवान के चौथे मोर्चे को ३०- ३१ सीटें मिलना संभावित प्रतीत होता है ,किंतु ऐसी दशा में किसी दल या गठबंधन को बहुमत पाने की दूर दूर तक कोई सम्भावना नही है ,निश्चित तौर पर चुनाव परिणाम के बाद कौन सा दल किस गठबंधन में जाएगा यह अभी कहना कठिन है,वैसे मैंने अपने पूर्व के पोस्ट में दोनों शीर्ष दलों के राष्ट्र हित में गठबंधन का सुझाव दिया था जो अत्यंत कठिन है क्यों की राजनीतिक दल सन्यासियों का नहीं होता जो पार्टी स्वार्थ से हटकर राष्ट्रहित में प्रस्तावित गठबंधन कर देश में संभावित सुधारों को लागू महज करने और देश में लोकतंत्र को और अधिक दृढ़ बनने हेतु एक छतरी के नीचे आ जायें । यदि ऐसा होता तो बहुत अच्छी बात होगी ।

Sunday, May 3, 2009

क्या दो सबसे बड़े राष्ट्रीय दलों का राष्ट्र हित में गठबंधन सम्भव नही ?

अभी चुनाव चल ही रहे हैं किंतु राजनितिक दलों में अभी से ही केन्द्र में अगली सरकार बनाने के लिए जोड़ -तोड़ शुरू हो गया है ,इस कार्य में वाम दलों और अन्य क्षेत्रीय दलों के नेता ज्यादा प्रयत्नशील दिखाई दे रहे हैं ,कल तक राष्ट्रीय जनतात्रिक गठबंधन के सहयोगी जनता दल(यूनाइटेड) जो २००४ तक सेकुलर नही था यकायक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पटरी के महा सचिव श्री प्रकाश करात की नजरों में सेकुलर होगया और सरकार बनाने की कयायद के तहत उनको तीसरे मोर्चे में शामिल कर सरकार बनाने का न्योता दे दिया ,और मजेदार बात यह कि जनता दल यूनाइटेड के नेता शरद यादव को भी वाम पंथियों की अच्छाई दिखाई देने लगी उधर दूसरी तरफ़ तीन दिन पहले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव ने मेरठ और मुजफ्फर नगर की चुनावी सभाओं में भाषण देते हुए जनता से कहा कि उनकी राय में अगले दस वर्षों तक केन्द्र में अस्थिरता होनी चाहिए,श्री यादव की इस बात के निहितार्थ स्वयं स्पष्ट है ,किंतु उनका भाषण चिंतनीय अवश्य है। वास्तव में उनका वक्तव्य एक सोचे समझे षडयंत्र का हिस्सा है जिसके विषय में राष्ट्र स्नेही जनों को विचार करना चाहिए । दक्षिण में सभी राजनितिक दल श्रीलंका में तमिलों के हित की जारही है और लिट्टे के कमांडर प्रभाकरन के विरुद्ध श्रीलंका सरकार और सेना की कार्यवाही रोकवाने के लिए केन्द्रीय सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है और यही मुद्दा तमिलनाडु में चुनाव का मुख्य मुद्दा बन गया है ,जबकि आपको स्मरण होगा कि पूर्व प्रधान मंत्री श्री राजीव गाँधी की हत्या लिट्टे कमांडर प्रभाकरन द्वारा कराया गया था ।अगली सरकार के गठन में तमिलनाडु के सांसदों का बहुत महत्त्व है और सुश्री जयललिता स्वयं वाम दलों के साथ चुनाव लड़ रही हैं ,ऐसे में वाम दलों के नेत्रित्व में तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने का प्रयास संभावित चुनाव परिणामों की दृष्टि से महत्त्व पूर्ण है किंतु राष्ट्रीय हित में सरकार गठन से अधिक स्थिर सरकार के गठन का मसला उससे जादा महत्वपूर्ण है ,इसलिए मेरा एक सुझाव राष्ट्रीय हित में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं,समर्थकों से है कि यदि आप निष्पक्ष रूप से विचार करे तो आप पाएंगे कि दोनों दलों की आर्थिक नीति ,विदेश नीति और परमाण्विक नीति लगभग समानता है अन्तर केवल छिटपुट के हैं जैसे कांग्रेस पार्टी स्वयम को सेकुलर और भाजपा को साम्प्रदायिक मानता है ,क्या राष्ट्र हित में और देश को सही दिशा प्रदान करने के लिए और अनेक संवैधानिक परिवर्तनों जैसे जन प्रतिनिधि कानूनों में किए जाने वाले संशोधन और आर्थिक विकास और विश्वव्यापी मंदी से निपटने के लिए कार्य ,और आतंकवाद से लड़ने के कार्य इतने ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसके लिए सरकार का स्थिर होना अनिवार्य है जिसके लिए छोटे -छोटे दलों के गठबंधन से ज्यादा अच्छा और टिकाऊ दोनों शीर्ष दलों का गठबंधन जरूरी है। पूर्व में भाजपा ने पहले १९९८ और दूसरी बार १९९९ से २००४ तक गठबंधन की सरकार चला रहे थे जिसमे उनके गठबंधन ने एक साँझा प्रोग्राम का मसौदा तय कर सरकार चलाया जिसमे भाजपा की घोषित नीति धारा-३७० की समाप्ति,राम जन्म भूमि ,कमान सिविल कोड जैसे तथाकथित विवादित विषयों को अलग कर दिया गया था ,इसी तरह कांग्रेस ने राजद,द्रमुक,लोजपा ,झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और वाम दलों के सहयोग से २००४ से अबतक सरकार चलाया गया,देखे तो इस गठबंधन में कांग्रेस और वाम दल दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी थे जिसके परिणाम स्वरुप परमाणु समझौते के समय दोनों का आपसी विरोध खुलकर सामने आगया . लिहाजा जिस प्रकार से मीडिया से खबरें आ रहीं हैं ,उनकों देखते हुए किसी एक दल को लोकसभा में बहुमत नही मिलना लगभग निश्चित है, उस दशा में जोड़- तोड़ से बनाने वाली किसी सरकार का स्थिर होना भी संदिग्ध है ,जबकि आज देश की आवश्यकता स्थिर सरकार की है . इसलिए देश के व्यापक हित में दोनों शीर्ष दलों के गठबंधन की सरकार आज देश की मांग है ,क्या यह सम्भव नही हो सकता यदि नही तो क्या दोनों दलों की राष्ट्रीयता संदेह के घेरे में नहीं है ?
कृपया आप गंभीरता से सोचे

Friday, May 1, 2009

तीसरे दौर में भी जनता की मतदान में रूचि नही दिखी

कल के तीसरे दौर के मतदान में भी जनता ने मतदान में उत्साह नही दिखाया, अबतक हुए मतदान में नए मतदाता जिनकी संख्या लगभग ढाई करोड़ बताई गयी है ने मतदान में अपनी अभिरुचि नही दिखायी जो अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है ,जबकि ढेर सारी कवायत देश भर में चुनाव आयोग के साथ अनेक संस्थाओ ने मतदाता को उसके अधिकार/कर्तव्य के लिए जागरूक करने का प्रयत्न किया परन्तु परिणाम वही धाक के तीन पात वाली कहावत की तरह ज्यो के त्यों देखने में आया,सही मायनों में यह लोक तंत्र के लिए शुभ लक्षण क़तई नही है पर चुनावों में जनता का सक्रिय सहयोग न करने के कारण और निवारण पर गंभीर विचार करना अनिवार्य होगया है।

मैंने इस पर बहुत चिंतन किया बाद में मेरे मन में भी कई सवाल उठे कि क्या इस भीषण आग उगलती गरमी में हमने ऐसी कौन सी सुविधा जनता को मुहैया कर रखी है जो आम मतदाता को उसमे मरने और जान देने को कह रहे हैं,सच्चाई से देखिये कि जिस देश में हम नागरिक से उसके कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहने की बात कह रहे हैं, उन्हें ६२ वर्षों की आज़ादी के बाद भी जरूरत के मुताबिक सामान्य जन जीवन की मौलिक आवश्यकता की चीजें नही मुहैया कराइ गई जैसे बिजली के बिना आज विकास की बात बेमानी है और सरकारें आवश्यकता के अनुरूप बिजली नही दे पा रहीं हैं ,स्वास्थ्य की बात करना दूर की बात है ,वहां पर यदि कोई मतदाता वोट देने जाते समय लू लगने से मर जाए तो उसे और उसके परिवार को शासन किस तरह से और क्या सुविधा मुहैया करा सकेगा , इस विषय में आप को कुछ भी बताने कि जरूरत नहीं है। क्या सारे कर्तव्य नागरिकों का है देश के नेता केवल कोरा भाषण देने के , वह भी कमजोर और मजबूत के व्यर्थ की बकवास में हमारा समय और धन का दुरुपयोग करते रहें ,यह अब नहीं चलेगा । किन लोगों ने इस भीषण गर्मी के मौसम में चुनाव की घोषणा की,जो एयर कंडिशनर में रहने वालों को शायद आम आदमी की परेशानी की एकदम परवाह नहीं है ,सच पूछे तो इन देश के नेताओं को चुनाव में जनता जितनी कम संख्या में भाग लेगी उसमे ही इनका फायदा है ,अब यदि ३५ प्रतिशत मतदान होने के बाद शेष ६५% ने एक प्रकार से सारे प्रत्याशियों को एक प्रकार से नकार दिया किंतु राजनीतिक दल के नेता कुल ७% मत पाकर जीतने वाले को लेकर अपना दांव खेलना शुरू कर देगा और फिर सरकार बनाने की जोड़ तोड़ करने और सरकार बनने के बाद जनता के खून पसीने की कमाई का दोहन कर ऐश करना शुरू कर देता है ,यदि ७० से ८० -८५ प्रतिशत मत पड़ने लगे तब इनकी मौज कैसे होगी ,इसलिए संभवतः साजिशन चुनाव ऐसे मौसम में रखा गया था,जबकि इन नेताओं को मालूम है की गर्मी के मौसम में अपने कृषि प्रधान देश में अप्रैल और मई के महीनों में किसान को अपनी मेहनत की कमाई फसल की कटाई और अगले फसल के लिए खेतों को तैयार करने के लिए सिंचाई का काम करना उसकी रोजी से जुडा मसला होता है वह पहले अपने काम को प्राथमिकता दे या वोट करने जाए ,साथ ही इसी मौसम में नई फसल के घर में आने के बाद उसके पास चार पैसे होते है जिनसे वह अन्य घरेलु काम जैसे शादी- विवाह आदि के दायित्वों को भी पूरा करता है ,आर्थिक रूप से सम्पन्न नागरिक के लिए जाडे के मौसम में शादियाँ होती है क्यो की वह उस मौसम में होने वाले खर्चों को करने में समर्थ होते हैं ,किंतु देश में बड़ी संख्या में नागरिक जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं या मध्यम वर्ग के जिन्हें आवश्यक आवश्यकता को पूरा कर पाने में अत्यन्त कठिनाई उठानी पड़ती है उसे शादी - विवाह जैसी पारिवारिक दायित्व को पूरा करने में और भी मुश्किल होती है ,इसीलिए इन्ही गर्मियों में शादी - विवाह का भी मौसम /लगन/सहालग होती है । जो सामाजिक रूप से अत्यन्त अनिवार्य काम होता है । चुनाव की घोषणा के पूर्व इन समाजिक पहलुओं पर विचार करना जरूरी था ,यदि शासन और जनता में इन विषयों पर संवाद हीनता की स्थिति है, निश्चित रूप से इसमे राजनीतिक दलों के मंशा ठीक नही है और वो नही चाहते की देश का आम नागरिक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में सही ढंग से भाग ले।क्यों की चुनाव आयोग ने सभी राजनितिक दलों से चुनाव के समय के लिए राय मशविरा करके चुनाव की तारीखें तय किया था ।
इमानदारी से जिन चुनाव क्षेत्रों में ६०% से कम मतदान हुआ उन सभी स्थानों पर चुनाव अवैध है और इन सभी स्थानों पुनः अगले जाडों में अर्थात नवम्बर या अगली फरवरी के महीनों में चुनाव कराये जाए अब समस्या है की इस अवधि में सरकार जिसका कार्यकाल जून तक है ,जून के बाद एक राष्ट्रीय सरकार का गठन किया जाय ओरयह सरकार अगले चुनाव के पूर्व लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में यह संशोधन करे और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में मतदान प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य है और मतदान न करने वाले मतदाता को कम से कम एक वर्ष के लिए उसके नागरिक अधिकारों से वाचित कर दिया जाएगा ,साथ ही ५०% से कम मत पाने वाला विजयी नही होगा और चुनाव में प्रत्याशी द्वारा जमा की जाने वाली जमानत की धनराशी बढाकर कम से कम एक लाख रुपये कर दी जाए जिससे फालतू के प्रत्याशी चुनाव में खड़े न हों ,इस प्रक्रिया को अपनाने में चनाव प्रक्रिया दो स्तरीय होगी ,का संशोधन किया जाय ।
आप सोच रहे होंगे की मैंने बहुत खर्चीली व्यवस्था का विकल्प दिया है परन्तु जब लोक तंत्र को हमने अपनाया है तो वह सही अर्थों के हो ,यदि आज की दोष पूर्ण व्यवस्था में जिस तरह से जनता का धन का अपव्यय राजनीतिक पार्टी कर रही क्या आपने उसका आकलन किया है ,एक अयोग्य सांसद और विधायक के को प्रति वर्ष दिया जाने वाला वेतन और भत्ता और ऊपर से उन्हें विकास के नाम पर सांसद और विधायक निधि के रूप में खर्च करने के लिए दी गई करोड़ों रुपयों की धनराशी और संसद और विधान सभाओं में वास्तविक काम काज पर व्यय होने वाली धनराशी और संसद की बैठकों में इन की भागीदारी तथा इन बैठकों के बहिष्कार की अवधि पर व्यय होने वाले राजस्व का आकलन करें तो चुनाव की अनिवार्यता और दो स्तरीय चुनाव की प्रक्रिया अब तक के व्यर्थ में व्यय होने वाले धन के अपव्यय की तुलना में कम आएगा।
साथ ही साथ वास्तविक बहुमत से चुने प्रतिनिधि का चरित्र आज के छद्म प्रतिनिधियों से अवश्य उत्तम होगा ।

Wednesday, April 29, 2009

तीसरे चरण का मतदान ३० अप्रैल को लेकिन इस बार मतदान का प्रतिशत बढ़ाना जरूरी है

तीसरे चरण का मतदान कल ३० अप्रैल को होना है ,इसमे कुल १०७ लोकसभा सदस्यों के लिए होना है जिसमे उत्तर प्रदेश के लखनऊ , कानपुर , रायबरेली,महाराष्ट्र में मुंबई ,लगभग पूरा गुजरात और कुछ मध्य प्रदेश के लोक सभा और कर्नाटक के सभी अवशेष क्षेत्रों के चुनाव होने है।इस चरण के चुनाव में बी०जे०पी० के प्रधान मंत्री के दावेदार श्री अडवानी एवं कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी के भाग्य का फ़ैसला जनता को करना है। वैसे तो इन दोनों ही नेताओं के जीतने में कोई संदेह नही है परन्तु इन दोनों ही शीर्ष नेताओं से इस चुनाव में बहुत अधिक अपेक्षा थी कि चुनाव के अवसर पर अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर खुली बहस हो किंतु चुनाव के पूरे परिदृश्य को देखने के बाद बहुत निराशा हुई ,बड़े मुद्दे यथावत धरे के धरे रहे किंतु राष्ट्रीय पार्टियों में बकवास और व्यक्तिगत आक्षेप के अलावा कोई सकारात्मक बहस नहीं हुई , पुराने मामले और कमजोर प्रधान मंत्री की बात का कोई औचित्य न होने के बाद भी यही बातें हुई भारतीय जनता पार्टी ने श्री मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधान मंत्री के विशेषण से नवाजा तो श्रीमती सोनिया गाँधी ने श्री लाल कृष्ण अडवानी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का नौकर कह डाला और श्री राहुल गाँधी जैसे नौजवान और उभरते नेता ने तो हद ही कर दी अडवानी जी को कंधार कांड का अभियुक्त तक बना दिया ,जिसकी अपेक्षा उनसे नही की गई थी।पहले के राजनीतिग्य चुनावी भाषणों में भी वरिष्ठ और कनिष्ठ का भाव रखते थे । अब जब बड़े राजनितिक दलों के ये हाल थे तो छोटे दलों और क्षेत्रीय दलों से कोई अपेक्षा पहले भी नही थी । किंतु इन हालत में जब देश के राजनेता अपने समुचित दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन न कर रहे हो तब देश की सुबुद्ध जनता को चुप नही बैठना चाहिए और तब उनका दायित्व और भी बढ़ जाता है ,उसे जो भी योग्य प्रत्याशी हो और खास तौर पर प्रत्याशी दागी और दल बदलू न हो साथ ही जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसे दूषित विचार का त्याग कर अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वाह बड़ी संख्या में मतदान केन्द्रों पर जाकर करना है अपने प्रतिनिधि का निर्वाचन करना होगा ।
यदि हम सबने ऊपर लिखे भाव से, अपने अधिकार से अधिक मतदान कार्य को दायित्व मान कर प्रयोग किए जाने के बाद अवश्य देश के नेताओं को एक सबक सिखाने के साथ अपने लिए नई व्यवस्था का सृजन करने में हम सफल होंगे। कृपया अपना उत्साह बनाये रखे।

Saturday, April 25, 2009

पहले दो चरणों के मतदान से निराशा

दोस्तों, इस लोकसभा के आम निर्वाचन में अधिक संख्या में मतदान के लिए अनेक स्वयं सेवी संस्थाओं ने और इलेक्ट्रानिक मीडिया तथा समाचार पत्रों ने जिस प्रकार जन जागरण का अभियान चलाया उससे यह एक आम तौर पर अनुमान लगाया जा रहा था कि इस चुनाव में अबतक के चुनावों से अधिक संख्या में मतदान होगा किंतु परिणाम निराशाजनक सामने आया। दक्षिण ,पूर्वी और पश्चिमी राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश ,बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मतदान अपेक्षा से कम हुए, यह एक बहुत गंभीर विचारणीय बात है ।इसके कारणों पर विचार किया जन अपेक्षित है और यह विचार उच्च स्तर पर भी किए जाने का विषय है ,यहाँ यह उल्लेख किया जन उचित है कि इन तीन राज्यों से बहुत अधिक लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हो कर आते हैं। अबतक प्राप्त तथ्यों से यह पता चलता है कि विगत कई वर्षों से इन राज्यों में अत्यधिक तापमान बढ़ जाने और गावों में किसानों द्वारा फसल की कटाई का काम चलने के कारण किसानों और निम्न और मध्य वर्ग का मतदाता मताधिकार का प्रयोग करने मतदान स्थल तक आने में असमर्थ था ,दूसरा कारण आम नागरिक का शासन व्यवस्था और राजनितिक प्रक्रिया में अविश्वास का होना जाहिर होता है । चुनाव में राजनितिक दलों द्वारा उचित ढंग से वास्तविक मुद्दे न उठाये जाने और मीडिया व् शासन के उच्चतम शिखर द्वारा बार -बार तथ्यों से आम जनता को गुमराह करने का प्रयास किया जन भी महत्वपूर्ण कारण है,उदहारण के तौर पर देश में बढती महगाई के सम्बन्ध में प्रधान मंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय मंदी अथवा विश्वव्यापी मंदी को कारण बताया और देश पर विश्वव्यापी मंदी का कम होने को अपने सरकार की उपलब्धियां बताते हुए अपने इसका श्रेय लेलिया गया ,जबकि वास्तविकता यह है की देश में आम तौर पर यह धारणा लोगों की है की जितनी चादर हो उतनी पैर फैलाना चाहिए,के आधार पर देश मंदी के भीषण दुस्प्रभावों से बचने में आंशिक रूप से सफल रहा,यदि पाश्चत्य आर्थिक व्यवस्था के अंतर्गत जहाँ हर व्यक्ति बैंकों के क्रेडिट कार्ड पर निर्भर करता है तथा बैंकों के मंदी की मार की चक्की में दब जाने के कारण आत्म हत्या तक करने को मजबूर होजाता है,इस देश में इस प्रकार की व्यवस्था से बच निकलने का आधार सिर्फ़ और सिर्फ़ पुरानी सोच का होना कारण है । जिस पर सरकार ने अपनी पीठ ख़ुद थापथपाली। iसी तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भी सरकार ने आम जनता को गुमराह करने और कंधार के मामले पर नई बहस कर अपनी कमी छुपाने का काम किया।
खैर उपर्युक्त कारणों का सही तरह से मूल्यांकन होना चाहिए किंतु सबसे अधिक मतदान कमी में यावा वर्ग का योगदान उचित नही हुआ जिससे ज्यादा तकलीफ हुई,चलिए अभी पूरा चुनाव आगे तीन चरणों का शेष है शायद कुछ अच्छे परिणाम आए ,इस नोट के साथ आज का पोस्ट समाप्त कर रहा हूँ।

Wednesday, April 22, 2009

राजनीतिक प्रतिद्वंदिता में कटुता का आधिक्य अनुचित

कल दूसरे चरण का मतदान पूरे देश में होना है किंतु ज्यों -ज्यों चुनाव आगे बढ़ रहा है त्यों-त्यों राजनितिक दलों में कटुता प्रतिद्वंदिता से बहुत ज्यादा अधिक हो गई है,बात प्रतिद्वंदिता के स्तर तक उचित है किंतु उससे अधिक यह वैमनस्यता का स्वरुप लेता जारहा है जो अनुचित है । यदि देखे तो सही मायनों में प्रत्येक दल का अस्तित्व देश हित के कारण है ,हर दल के सिद्धांत राष्ट्र हित के इर्द गिर्द ही होने चाहिए किंतु सत्ता का युद्ध देश में कुछ जरूरत से ज्यादा ही कटु होता जा रहा है । देश की सभी बड़ी छोटी और क्षेत्रीय सभी दल एक दुसरे के विरुद्ध विष वमन कर रहे है,यह इस हद तक पहुच गया है की पार्टियों के शीर्ष नेता एक दुसरे पर व्यक्तिगत स्तर पर आकर बयान दे रहे हैं ,ऐसा लगरहा है की मर्यादा समाप्त हो गई है ,प्रधान मंत्री,लोक सभा के प्रतिपक्ष के नेता पार्टी के अध्यक्ष सभी घिनौना आरोप लगा रहे हैं ,जब की इसी देश में गीता का ज्ञान भगवान श्री कृष्ण ने दिया था जिसके अनुसार युद्ध सदैव अच्छाई और बुरे के मध्य होता है और सत्य और धर्म के लिए शास्त्र उठाने का आवाहन किया गया किंतु युद्ध के भी कुछ नियम होते हैं की शत्रु के भी कमर के नीचे वार नही किया जाता था किंतु देश के वर्तमान नेताओं ने सारी मर्यादायों का एक तरह से परित्याग कर दिया है ,जो देश के लोकतंत्र के भविष्य के लिए अच्छा नही है । इसलिए मेरी सभी स्तरीय नेताओं से निवेदन है कि सभी नेता कृपा करके अपनी अपनी मर्यादा में रहते हुए चुनाव को खेल भावना से होने दे ।
इन नेताओं को याद मैं दिलाना चाहता हूँ कि १६ मई को चुनाव के परिणाम आ जायेंगे फिर सभी निर्वाचित सांसदों को एक साथ बैठना होगा और देश की समस्या का समाधान ढूढना होगा,इस कार्य में एक दूसरे से संवाद करना होगा तब यह चुनावी कटुता देशहित के बीच में अवश्य आएगी । मेरा मानना है की देश की शीर्ष दलों में संवाद हीनता अनुचित है । यदि आप कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के मुख्य विचार धारा के विषय में में चिंतन करे तब निष्कर्ष यह निकलेगा की दोनों ही पार्टियाँ मध्यम मार्गीय है,आर्थिक विचार धारा भी एक सी है ,केवल नेत्रित्व और पार्टियों के संगठन में चयन की प्रक्रिया की भिन्नता है और दूसरे अनावश्यक रूप से सेकुलर और तथा कथित साम्प्रदायिकता का विरोध दिखाई देता है ,मैं आप से पूछना चाहता हूँ की देश की सत्ता की बागडोर भारतीय जनता पार्टी के पास १९९८ से २००४ तक थी क्या उस समय देश से अल्प संख्यकों को देश से बहार करने या किसी प्रकार से उत्पीडन हुआ ,केवल गुजरात के दंगों को अपवाद स्वरुप से कहा जा सकता है अन्यथा पूरा ६ वर्षों का शासन सामान्य था यदि गुजरात के दंगों की बात होती है तो मैं याद दिलाना चाहता हूँ की श्रीमती इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद सिक्खों के विरुद्ध दिल्ली और समूचे उत्तर भारत में मारे गए सिक्खों की संख्या शायद किसी भी एक संप्रदाय के सबसे अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था यह घटना स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे बड़ी घटना है ,इसके अतिरिक्त अनेक दंगे कांग्रेस के शासन काल में हुए उदाहारण स्वरूप मेरठ ,अलीगढ,वाराणसी,भागलपुर आदि में हुए क्या इन दंगों में अल्पसंख्यकों को क्षति नही पहुचाई गई , इसलिए मैं सेकुलर और साम्प्रदायिकता के फालतू बहस में चुनाव के अतिरिक्त नेताओं और आम नागरिक को ध्यान नहीं देना चाहिए । वैसे नियमतः चुनाव में भी इस बहस में नेताओं को समय बर्बाद न कर सार्थक और देशहित की बहस होनी चाहिए किंतु सार्थक चर्चा का पूरे अबतक हुई चर्चा का आभाव सभी दलों की तरफ से देखने को मिला । उचित हो की स्वस्थ आलोचना और बीती ताहि बिसार दे के साथ बातें हो,सभी दल अपने भविष्य की सार्थक नीतियों जैसे विकास ,अर्थ व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंक वाद और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों आदि पर बहस होनी चाहिए , उम्मीद करता हूँ की अभी चुनाव के पाँच चरणों में से केवल दूसरा चरण कल पूरा होने वाला है और अभी तीन चरण होने शेष हैं शायद अब सभी दलों में वैचारिक और व्यावहारिक परिवर्तन देखने को मिले।

Wednesday, April 15, 2009

लोक सभा निर्वाचन २००९ के दो महत्वपूर्ण मुद्दे

वर्तमान चुनाव के पहले चरण का दिन अब १२ घंटे से कम शेष है,अब जनता का फोकस चुनाव के दो मुद्दे जो मिडिया के मार्फ़त सामने आए है उनमे सबसे पहला मुद्दा विकास का और दूसरा मुद्दा आतंकवाद का है । अब जनता इन दोनों मुद्दों के आधार पर वोट देती है या पहले की तरह जाति,धर्म के आधार पर यह देखने की बात होगी .यदि भारतीय जनतंत्र स्वस्थ्य हुआ होगा तो जनता को निशित रूप से इन्ही दोनों मुद्दों पर अपना फोकस बनाये रखते हुए वोट करना होगा। यदि किसी मतदाता ने अभी तक न सोचा है तो आज और अभी सोच ले । क्यो की उनको यह अबतक के सामाजिक व्यवस्था से अनुभूत कर लिया होगा कि समाज में जिस प्रकार से अर्थ/धन का महत्त्व बढ़ा है उससे समाज में जाति के अलावा आर्थिक स्थिति ने संबंधों का स्थान बना लिया है ,इसी तरह यदि दो समकक्ष आर्थिक रूप से समान व्यक्तियों में भिन्न धर्म होने के बाद भी आपसी मित्रता होती है ,अब एक जाति या एक सम्प्रदाय का होना संबंधों का आधार नही रह गया है ,कम से कम समाज के आर्थिक रूप से संपन्न लोगों में तो कतई नहीं । पूर्व में भी ऐसा ही था किंतु मिडिया आज की तरह प्रभावी नही था जिसके कारन आम आदमी को ऐसे संबंधों की जानकारी नही हो पति थी । इसलिए आज वास्तविकता के अनुरूप मतदाता को बिना जाति बिरादरी और धर्म और सम्प्रदाय के पचडे में पड़े सीधे सीधे इन्ही दोनों मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए किसी एक राष्ट्रीय दल अथवा उन्ही के गठबंधन को वोट करे इसी में समाज और देश की भलाई है । फालतू सेकुलर और नान सेकुलर के चक्कर में न पड़े । सेकुलर और नान सेकुलर की बात केवल राजनितिक दुराग्रह के अलावा और कुछ भी नही है । जनता से यह आग्रह भी है की जिस भी दल या गठबंधन को वोट करे उसे इतनी संख्या में लोक सभा में जिताए की उस दल को पूरी तरह दायित्व निर्वहन का अवसर मिले और आगे चलकर दल को यह कहने का अवसर न रहे की उसके पास सदन में इतनी संख्या नही जिसके कारण वो अमुक कार्य नही कर सके । सदन में पूर्ण बहुमत के आभाव में अन्य दलों को सौदे बाज़ी का मौका कम से कम जनता इस चुनाव में तो न ही दे ।
लोकतंत्र में बहुत संख्या में दलों का होना बहुत शुभ लक्षण नही है । आवश्यकता अब समान विचार धारा के दलों का आपस में ध्रुवीकरण की है ,जिसे आगे चलकर लोकतंत्र और दृढ़ और सशक्त होगा । प्राय: सभी विकसित देशों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था में दो या तीन दल से अधिक नही होते हैं,जैसे हम जानते हैं की अमेरिका में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दो पार्टियाँ है ,ब्रिटेन में लेबर,कंजर्वेटिव और लिबरल तीन पार्टियाँ है । इसी तरह जर्मनी और फ्रांस में तीन तीन पार्टियाँ हैं । जैसा की आप जानते हैं की इस देश का संविधान अमेरिका और ब्रिटेन के अंशों से बना हैं ,इसके विपरीत यहाँ दलों की संख्या बहुत अधिक हो जाने की वजह से जनता के मतों का अनावश्यक ढंग से विभाजन होता है और कई बार थोड़े से अधिक वोट पाने वाला प्रत्याशी चुनाव में विजयी हो जाता है । वोट देने के पहले इन बातों का ख्याल आप के जेहन में रहना जरूरी है ।
यहाँ इस पोस्ट में मैं पार्टियों के घोषणा पत्रों का उल्लेख करना चाहूँगा जिनमे जनता को अनेक प्रकार के सुनहरे सपने दिखाए गए हैं ,जैसे जनता की आर्थिक दशा में सुधर करने के वादे,सड़क बनवाने ,अस्पताल,विद्यालय और कृषि में किसानों को अनेक तरह की सुविधा मुहैया कराये जाने की बातें और वादे होते हैं किंतु आज तक जनता ने वास्तविक रूप में पार्टयों से हिसाब नही लिया नतीजा देश की जनता जहाँ के तहां पड़ी है जबकि नातों की आर्थिक स्थिति में अभूतपूर्व सुधार हुआ है ,चुनाव आयोग के निर्देश के बाद अब चुनाव में सभी प्रत्यशियों को अपनी अम्पत्ति चल और अचल सभी का व्यौरा देना पड़ रहा जिससे यह स्पष्ट हो गया है की नेताओं में अधिकांश नेता करोडो की संपत्ति अर्जित किए हैं । जनता को अब इसका हिसाब भी लेने की जरूरत है की इन नेताओं ने यह दौलत कहाँ और कैसे बनाई । जिससे चुनाव लड़ने वाले और सांसदों और विधायकों पर जनता दबाव बना रहे और वे सुचिता से काम करे ।