Sunday, April 12, 2009
तुष्टीकरण की राजनीति का अंत कब होगा
चुनाव सर पर है अब पहले चरण के मतदान में सिर्फ़ ४ दिन बाकी हैं ,इसने बड़े-छोटे सभी नेताओ की नीद हराम कर दी है और चुनावी बौखलाहट में नेता और पार्टियाँ किसी भी हद तक जाने के लिए तत्पर हैं। बौखलाहट सभी पार्टियों में फैली है , छोटी -बड़ी , राष्ट्रीय - क्षेत्रीय सभी दलों में दिखाई दे रही है।जिसके चलते सारी आचारसंहिता समाप्त हो गई ,धर्म निरपेक्ष कहलाने वाले दलों में मुस्लिम तुष्टिकरण का घमासान चल रहा है । धर्मनिरपेक्षता की चैम्पियन कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव एवं आन्ध्र प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष ने तो धर्मनिरपेक्षता की आड़ में मुस्लिम तुष्टिकरण करते हुए सांप्रदायिक सद्भाव को तार तार कर दिया किंतु आश्चर्यजनक रूप से चुनाव आयोग अथवा उन प्रान्तों की सरकारों ने आज तक वरुण गाँधी के मामले में जितनी सख्ती हुई उसके इर्द गिर्द भी कार्यवाही नही किया। आपको याद होगा कि कांग्रेस नीत केन्द्रीय सरकार ने सच्चर आयोग का गठन किया था, जिसने अल्पसंख्यकों को सरकारी सेवा / सेनाओं में भी अल्पसंख्यकों के आरक्षण कि रिपोर्ट दी थी, हमारे प्रधान मंत्री महोदय ने तो देश की समस्त सम्पदा पर आल्पसंख्यकों के पहला अधिकार की बात तक कह दिया था ,आज इसी क्रम में समाजवादी पार्टी ने अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी किया जिसने अल्पसंख्यकों की एक संस्था में विदेशी छात्रों को शिक्षा पाने के नाम पर कानूनी तौर पर स्टुडेंट वीसा दिए जाने का वादा तक कर दिया है। चुनाव घोषणा पत्र के बहाने सपा तुष्टिकरण का काम कर रही है । पाठकों गुजरात, अहमदाबाद, कालूपुर-दरियापुर-नरोडा पाटिया, ग्राहम स्टेंस, कंधमाल आदि के नाम सतत सुने होंगे, लेकिन मराड, मलप्पुरम या मोपला का नाम नहीं सुना होगा… यही खासियत है नेताओ, वामपंथी और सेकुलर लेखकों और इतिहासकारों की। मीडिया पर जैसा इनका कब्जा रहा है और अभी भी है, उसमें आप प्रफ़ुल्ल बिडवई, कुलदीप नैयर, अरुंधती रॉय, महेश भट्ट जैसों से कभी भी “जेहाद” के विरोध में कोई लेख नहीं पायेंगे,कभी भी इन जैसे लोगों को कश्मीर के पंडितों के पक्ष में बोलते नहीं सुनेंगे, कभी भी सुरक्षाबलों का मनोबल बढ़ाने वाली बातें ये लोग नहीं करेंगे, क्योंकि ये “सेकुलर” हैं… इन जैसे लोग “अंसल प्लाज़ा” की घटना के बारे में बोलेंगे, ये लोग नरोडा पाटिया के बारे में हल्ला मचायेंगे, ये लोग आपको एक खूंखार अपराधी के मानवाधिकार गिनाते रहेंगे, अफ़ज़ल गुरु की फ़ाँसी रुकवाने का माहौल बनाने के लिये विदेशों के पाँच सितारा दौरे तक कर डालेंगे…।मित्रों तुष्टिकरण का यह खेल देश की आज़ादी के बाद से ही चल रहा है और कब तक चलेगा । हम जब तक इन सबको गंभीरता से नही लेंगे और सरकार के चयन में ऐसे ही अन्यमनस्क होकर लापरवाही दिखायेंगे तो इसका परिणाम हमारे बाद हमारी अगली पीढी को भी भुगतना होगा । कभी मन कहता है हमसब सोये हुए हैं, जिनको मैं जगाने का प्रयास कर रहा हूँ किंतु वास्तविकता तो कुछ और ही है हम सोये नही जगे हुए हैं और आपको मालूम ही है की जागे को नही जगाया जाता है।
Friday, April 10, 2009
लोकतंत्र में मतदान की अनिवार्यता की जरूरत है
आज मुझसे किसी अपने मिलने वाले युवक ने कहा कि क्या वोट का बहिष्कार करने का मतदाता को अधिकार चुनाव नियमों में संविधान द्वारा प्राप्त है जिसका उत्तर मैं इस पोस्ट में देना चाहता हूँ ,भारतीय जनप्रतिनिधि कानून के अनुसार वोट के बहिष्कार का अधिकार कि मान्यता इस अधिनियम में न होकर उसका स्वरुप कुछ इस प्रकार है कि यदि मतदाता पोलिंग बूथ पर जाकर पीठासीन अधिकारी के समक्ष यह बात कहे कि चुनाव के लिए जितने भी प्रत्याशी मैदान में हैं वो सभी अयोग्य है और वो इनमे से किसी को भी मत/वोट देना नही चाहता,उस दशा में पीठासीन अधिकारी को एक पुस्तिका में मतदाता का नाम सहित पूरा विवरण लिखकर मतदाता से हस्ताक्षर करेगा। यदि ऐसे मतदाताओं कि संख्या विजयी प्रत्याशी के मत से अधिक होने पर पुन: चुनाव की प्रक्रिया की जाने का उल्लेख है ,यह मैं अपने संज्ञान के आधार पर लिख रहा हूँ ,अब प्रश्न उठता है कि जिस प्रक्रिया का उल्लेख ऊपर किया गया है उसका कोई औचित्य वास्तव में कोई नही है न ही इस का कभी उपयोग किया जा सका । मेरे मत से जन प्रतिनिधि कानून में वैसे तो कई महत्वपूर्ण संशोधन किया जाना जरूरी है, परन्तु इस देश में स्विट्ज़रलैंड यथा कुछ अन्य योरोपीय देशों जैसा रिकाल(वापस बुलाने )के अधिकार मतदाता को विजयी सांसदों के अब तक के कार्य और व्यवहार को देख लेने के पश्चात् मतदाता को उन्हें वापस बुलाने का मिलना उचित है ,किंतु भारत कि तुलना स्विट्जरलैंड और उस जैसे देशों से नही कि जा सकती । जिन देशों में रिकाल का अधिकार मतदाता को प्राप्त है उनकी जनसँख्या बहुत कम और क्षेत्रफल भी कम वाले देश हैं ,इसलिए भारत में इस तरह के परिवर्तन के पहले इसके प्रायोगिक कठिनाइयों को अच्छी तरह जा लेना होगा । हमारा देश दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला लोकतंत्र है जो क्षेत्रफल,जनसंख्या,विभिन्न भाषाओँ और विभिन्न सम्प्रदायों का है ,इन विषयों पर विचार कर ही कोई संशोधन किए जाने चाहिए ।
अब प्रश्न यह होता है कि मतदान का बहिष्कार कि क्या आवश्यकता आ गयी ,आवश्यकता तो अधिक से अधिक संख्या में मतदान के प्रतिशत को बढ़ने और जागरूक मतदाता की तरह मतदान करने की है और मतदान के पहले सर्वथा सबसे योग्य प्रत्याशी को वोट देने की है किंतु साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि प्रत्याशी अपराधी,दलबदलू,और क्षेत्रीय पार्टी का न हो ,अन्यथा आप के वोट का सौदा पार्टी के मुखिया द्वारा अपने व्यक्तिगत हित में आपके दिए मत का दुरुपयोग कर लेगा ,परोक्ष रूप से पार्टी का सबसे बड़ा नेता जो एक प्रकारसे पार्टी का अधिनायक होता है,के हाथ हमने आने वाले पाँच साल सौप दिया । आपको इस बात से सतर्क रहना होगा ।आज देश की सभी क्षेत्रीय पार्टियाँ केवल जातिवादी आधार पर बनाई गयी ,इसका उदहारण उत्तर प्रदेश से देखना शुरू करे तो हम पायेंगे की समाजवादी पार्टी का गठन जब किया तो उसका नाम समाजवादी पार्टी जरूर रखा किंतु यह पार्टी पुरानी स्व०राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली पार्टी नही है ,बल्कि यह पार्टी केवल जाति विशेष के नाम पर श्री मुलायम सिंह यादव द्वारा बनाई . किंतु उनका हित और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पार्टी बनाये जाने की जरूरत होने की वजह से बनी ,अन्यथा तब जनता दल जो तब स्व० विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में थी और मा० मुलायम सिंह जी उसी पार्टी के प्रदेश में मुख्या मंत्री रह चुके थे ,किन कारणों से नयी पार्टी के गठन की आवश्यकता थी ,इसी तरह से श्री अजीत सिंह जी ने जनता दल से केवल जातिगत वोटों के आधार पर पुँरानी लोकदल को पुनर्जीवित किया किया इनका भी अलग पार्टी बनाने का कारण आप सब जानते ही हैं ,अपना दल पार्टी का गठन भी केवल जाति विशेष के मत के आसरे है किंतु दुर्भाग्य से इस पार्टी के स्वामी श्री सोनेलाल पटेल को जनता ने गौरवान्वित नही किया ,जिसके कारण पार्टी की दशा सोचनीय बनी है किंतु लोकतंत्र का अहित अच्छे प्रत्याशी का वोट काटकर अवश्य कर रहे हैं ,इसी तरह से बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और श्री लालू प्रसाद जी और लोकतांत्रिक जनता पार्टी श्री राम विलास पासवान की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और जातिगत वोटों के ध्रुवीकरण के इरादे से बनी और इनके परिणाम प्रदेश की भोली भाली जनता को भुगतना पड़ा । कभी फिर क्षेत्रीय दलों के भारत के अन्य प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों पर चर्चा होगी । फिलहाल तो इस लोक सभा के चुनाव में सभी पाठकों से शत प्रतिशत मतदान करने की महती अपेक्षा है ।
कल मैंने इसी विषय पर श्री सूर्य कुमार पांडे की कविता का उल्लेख किया था ,आशा करता हूँ की आप सब को पसंद आयी होगी और देश को यह दिखा दे कि हम सब अब जागरूक होगये हैं ।आईये हमसब यह उदघोष करे : -
"अबकी जनता जागी है और परिवर्तन की बारी है "
अब प्रश्न यह होता है कि मतदान का बहिष्कार कि क्या आवश्यकता आ गयी ,आवश्यकता तो अधिक से अधिक संख्या में मतदान के प्रतिशत को बढ़ने और जागरूक मतदाता की तरह मतदान करने की है और मतदान के पहले सर्वथा सबसे योग्य प्रत्याशी को वोट देने की है किंतु साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि प्रत्याशी अपराधी,दलबदलू,और क्षेत्रीय पार्टी का न हो ,अन्यथा आप के वोट का सौदा पार्टी के मुखिया द्वारा अपने व्यक्तिगत हित में आपके दिए मत का दुरुपयोग कर लेगा ,परोक्ष रूप से पार्टी का सबसे बड़ा नेता जो एक प्रकारसे पार्टी का अधिनायक होता है,के हाथ हमने आने वाले पाँच साल सौप दिया । आपको इस बात से सतर्क रहना होगा ।आज देश की सभी क्षेत्रीय पार्टियाँ केवल जातिवादी आधार पर बनाई गयी ,इसका उदहारण उत्तर प्रदेश से देखना शुरू करे तो हम पायेंगे की समाजवादी पार्टी का गठन जब किया तो उसका नाम समाजवादी पार्टी जरूर रखा किंतु यह पार्टी पुरानी स्व०राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली पार्टी नही है ,बल्कि यह पार्टी केवल जाति विशेष के नाम पर श्री मुलायम सिंह यादव द्वारा बनाई . किंतु उनका हित और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पार्टी बनाये जाने की जरूरत होने की वजह से बनी ,अन्यथा तब जनता दल जो तब स्व० विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में थी और मा० मुलायम सिंह जी उसी पार्टी के प्रदेश में मुख्या मंत्री रह चुके थे ,किन कारणों से नयी पार्टी के गठन की आवश्यकता थी ,इसी तरह से श्री अजीत सिंह जी ने जनता दल से केवल जातिगत वोटों के आधार पर पुँरानी लोकदल को पुनर्जीवित किया किया इनका भी अलग पार्टी बनाने का कारण आप सब जानते ही हैं ,अपना दल पार्टी का गठन भी केवल जाति विशेष के मत के आसरे है किंतु दुर्भाग्य से इस पार्टी के स्वामी श्री सोनेलाल पटेल को जनता ने गौरवान्वित नही किया ,जिसके कारण पार्टी की दशा सोचनीय बनी है किंतु लोकतंत्र का अहित अच्छे प्रत्याशी का वोट काटकर अवश्य कर रहे हैं ,इसी तरह से बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और श्री लालू प्रसाद जी और लोकतांत्रिक जनता पार्टी श्री राम विलास पासवान की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और जातिगत वोटों के ध्रुवीकरण के इरादे से बनी और इनके परिणाम प्रदेश की भोली भाली जनता को भुगतना पड़ा । कभी फिर क्षेत्रीय दलों के भारत के अन्य प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों पर चर्चा होगी । फिलहाल तो इस लोक सभा के चुनाव में सभी पाठकों से शत प्रतिशत मतदान करने की महती अपेक्षा है ।
कल मैंने इसी विषय पर श्री सूर्य कुमार पांडे की कविता का उल्लेख किया था ,आशा करता हूँ की आप सब को पसंद आयी होगी और देश को यह दिखा दे कि हम सब अब जागरूक होगये हैं ।आईये हमसब यह उदघोष करे : -
"अबकी जनता जागी है और परिवर्तन की बारी है "
Thursday, April 9, 2009
जनता से केवल उचित प्रत्याशी के लिए वोट देने का निवेदन
वर्तमान चुनाव का पहला दौर १६ अप्रैल से शुरू हो रहा है ,चुनाव में अनेकों मुद्दे है पर देश की सुरक्षा के लिए आतंकवाद और देश की अर्थ व्यवस्था का मुद्दा सबसे अहम् है ,जिसके लिए जनता को सभी पार्टियों के ट्रैक रिकार्ड को देखना और समझना होगा । हमको प्रत्याशी के चयन के लिए कई बातों पर गौर देना होगा। इसमे सबसे पहले हमें देखना होगा की प्रत्याशी दल -बदलू न हो,दूसरी उसमें जन सेवा की भावना हो,तीसरी वह अवसरवादी न हो ।इन सभी के आधार पर प्रत्याशी का मूल्यांकन करने,उसके बाद ही आप उसी प्रत्याशी को वोट दे जिसे इन कसौटियों पर आप खरा पाए , इस सिलसिले में मुझे श्री सूर्य कुमार पांडे,व्यंगकार की इसी चुनाव के सिलसिले में एक रचना बहुत पसंद आई जिसका का उद्धरण नीचे देरहा हूँ : -
चमचों की न सुने ,सपने विकास के बुने ।
जो बाद इलेक्शन भी आए,सूरत पब्लिक को धिख्लाये ।।
जो नकली मरहम नही लगाये ,मुझ वोटर के घावों में,
मैं उसको अपना वोट करूंगा,अबकी चुनाव में,
जनसेवा जिसकी टेक रहे ,जो वचन कर्म में एक रहे,
जो रहा नही अवसरवादी,जो हो न दल बदल का आदी,
जो यदा कदा ही सही खड़ा हो,दुःख सुख और अभावों में,
मैं उसको अपना वोट करूंगा अबकी बार चुनावों में,
पार्टियाँ कई वे ही चहरे , सब ऊँचे कलाकार ठहरे,
इनके वायदे चुनावी सब,आऊंगा नही छलावों में,
मैं सोच समझकर वोट करूंगा,अबकी बार चुनावों में।
आज बस इतना ही आगे अगली पोस्ट में
चमचों की न सुने ,सपने विकास के बुने ।
जो बाद इलेक्शन भी आए,सूरत पब्लिक को धिख्लाये ।।
जो नकली मरहम नही लगाये ,मुझ वोटर के घावों में,
मैं उसको अपना वोट करूंगा,अबकी चुनाव में,
जनसेवा जिसकी टेक रहे ,जो वचन कर्म में एक रहे,
जो रहा नही अवसरवादी,जो हो न दल बदल का आदी,
जो यदा कदा ही सही खड़ा हो,दुःख सुख और अभावों में,
मैं उसको अपना वोट करूंगा अबकी बार चुनावों में,
पार्टियाँ कई वे ही चहरे , सब ऊँचे कलाकार ठहरे,
इनके वायदे चुनावी सब,आऊंगा नही छलावों में,
मैं सोच समझकर वोट करूंगा,अबकी बार चुनावों में।
आज बस इतना ही आगे अगली पोस्ट में
Tuesday, April 7, 2009
चुनाव के दौरान नेताओं की बेलौस बयानबाजी
लोकतंत्र में जनता के पास नेताओं को कम से कम चुनाव के लिए जाना पड़ता है , नेता अपने चुनाव क्षेत्र में प्रचार के लिए जाते हैं उसका उद्देश्य अपने पिछले किए कामों से क्षेत्र की जनता को अवगत कराने के अलावा जनता का विश्वास बना रहे इसके लिए अपने भविष्य में किए जाने वाले कामों का उल्लेख करते हैं ,साथ ही अपने विपक्षियों की आलोचना करते हैं किंतु विगत कुछ समय से नेताओं के वाणी पर संयम का अभाव देखने को मिल रहा है,जो लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण नही है । आलोचना का लोकतंत्र में स्थान प्राप्त है परन्तु इस कार्य में उन्हें भाषणों में संयमित भाषा का प्रयोग करना चाहिए । अभी हाल में बिहार के किशनगंज में अपने प्रत्याशी के प्रचार में श्री लालू प्रसाद ने श्री वरुण गाँधी के पीलीभीत में पिछले बयान के लिए अल्पसंख्यक समुदाय के समक्ष कहा कि "यदि वह देश के गृह मंत्री होते तो वरुण गाँधी पर रोड रोलर चलवा देते" , श्री यादव जैसे वरिष्ठ नेता से इतने घटिया बयान कि अपेक्षा सभ्य समाज को स्वीकार नही होगी । प्रतद्वंदिता के साथ नेताओं को याद रखना चाहिए कि युद्ध के भी नियम होते हैं, उन्हें प्रतिपक्षी पर कमर के नीचे वार नही करना चाहिए । लोकतंत्र में संयम आवश्यक है ,जनता को नेताओं की इस तरह की बयानबाजी का विरोध करना चाहिए ,लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ मीडिया को भी नेता के घटिया भाषण को अपने समाचार पत्रों में प्रमुखता नही देनी चाहिए,आज इलेक्ट्रोनिक मीडिया का बहुत ज्यादा महत्त्व होगया है ,उन्हें भी ऐसे नेता के निम्नकोटि के बयान को अपने चैनलों पर प्रमुखता प्रदान नही करनी चाहिए ,क्योकि लोकतंत्र में उनका बहुत बड़ा योगदान होता है,उन्हें अपने समाचार पत्र प्रसार बढाने या चैनल के टी० आर० पी० बढाने के बजाय इस महा पर्व में अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन करना चाहिए ।
ऊपर मैंने उदहारण के तौर पर श्री यादव के बयान का उल्लेख कर दिया है,जबकि बहुत से और नेता अन्य पार्टियों के भी हैं जो इसी तरह के घटिया बयान देने के आदी है ,उन्हें भी भविष्य में अपने बयानबाजी के स्तर में सुधर लाये । आज के सभी समाचार पत्रों में श्री यादव का बयान बहुत प्रमुखता से प्रकाशित हुआ है ,इसी तरह सभी टी० वी० चैनलों पर पर इस बयान को प्रमुखता के साथ दिखाया गया है , यह नेताओं के निम्न स्तर को दर्शाता है ,राजनीती मसखरापन की जगह नही और न ही किसी नयी फ़िल्म के पहले दिन के प्रदर्शन की तरह से नही है ,मिडिया को भी अपने सामाजिक दायित्वों का पालन करना चाहिए ,यहाँ मैं आज की और घटना का उल्लेख करना चाहूँगा ,यह घटना दिल्ली में गृहमंत्री श्री चिदंबरम के प्रेस कांफ्रेंस के समय किसी पत्रकार द्वारा उन पर जूता चलाने की घटना हुई जिसकी सभी को आलोचना करनी चाहिए ।
ऊपर मैंने उदहारण के तौर पर श्री यादव के बयान का उल्लेख कर दिया है,जबकि बहुत से और नेता अन्य पार्टियों के भी हैं जो इसी तरह के घटिया बयान देने के आदी है ,उन्हें भी भविष्य में अपने बयानबाजी के स्तर में सुधर लाये । आज के सभी समाचार पत्रों में श्री यादव का बयान बहुत प्रमुखता से प्रकाशित हुआ है ,इसी तरह सभी टी० वी० चैनलों पर पर इस बयान को प्रमुखता के साथ दिखाया गया है , यह नेताओं के निम्न स्तर को दर्शाता है ,राजनीती मसखरापन की जगह नही और न ही किसी नयी फ़िल्म के पहले दिन के प्रदर्शन की तरह से नही है ,मिडिया को भी अपने सामाजिक दायित्वों का पालन करना चाहिए ,यहाँ मैं आज की और घटना का उल्लेख करना चाहूँगा ,यह घटना दिल्ली में गृहमंत्री श्री चिदंबरम के प्रेस कांफ्रेंस के समय किसी पत्रकार द्वारा उन पर जूता चलाने की घटना हुई जिसकी सभी को आलोचना करनी चाहिए ।
Monday, April 6, 2009
भारत के निर्वाचन नियमावली में आमूल संशोधन अपेक्षित
वैसे तो परिवर्तन प्रकृति का नियम है फिर जब देश के संविधान की बात हो तब परिवर्तन का तात्पर्य बहुत गंभीर हो जाता है । आपको ज्ञात है की हमारे संविधान में १९५० से अब तक बहुत अधिक परिवर्तन /संशोधन हो चुके हैं, जिसके कारण वर्तमान संविधान अपना मौलिक स्वरूप खो चुका है ,वास्तव में तो देश की बदली दशा में एक नए संविधान की आवश्यकता है ,जिसके लिए पुन: संविधान सभा के गठन कर नए संविधान की आवश्यकता है किंतु यह बात कभी और की जायेगी । संविधान संशोधन की तरह समय - समय पर चुनाव कानूनों में भी संशोधन होते रहे हैं, किंतु आज समय की मांग के अनुरूप हमारे देश के चुनाव सम्बन्धी नियम संशोधित नही किए जा सके। जिसका कारण १९८९ के बाद किसी भी एक दल को संसद के दोनों सदन में अपेक्षित संख्या बल न होने के कारण संशोधन नही किया जा सका , यह पहला करण था किंतु दूसरा और ज्यादा महत्त्वपूर्ण करण राजनितिक दलों में सही संशोधन की इच्छा शक्ति कि कमी और आपसी सहमति का न बन पाना था । जिसकी वजह से आजतक चुनाव लड़ने से माफिया- गुंडों और असामाजिक तत्वों पर चुनाव आयोग को रोक लगाने का अधिकार नही प्राप्त हो सका । आज एक समाचार पत्र में मैंने पढ़ा कि आस्ट्रेलिया में नागरिक के मतदान में भाग न लेने पर अर्थदंड और एक वर्ष के लिए उसके मताधिकार को निरस्त कर दिया जाने का नियम है , भारत में भी इसी तरह का परिवर्तन / संशोधन करना आवश्यक है ,अन्यथा देश का बहुसंख्यक मतदाता चुनाव में भाग लेने से परहेज़ करता रहेगा और थोड़े वोट पाकर अपराधी चुनाव जीत कर संसद और विधान सभा में पदासीन होते रहेंगे । अब पानी सर के ऊपर हो चुका है जिसका स्वरूप हमारे सामने है ,पिछली लोक सभा में बहुत बड़ी संख्या में दागी संसद सदस्य थे जो प्राय: सभी दलों के थे. इनमे राष्ट्रीय पार्टियाँ भी सम्मिलित हैं किंतु विशेष कर क्षेत्रीय दलों ने कुछ अधिक कुख्यात अपराधियों को प्रत्याशी बना कर खड़ा किया था,जिनके दागी संसाद सदन में थे । इस चुनाव में भी बड़ी संख्या में दागी प्रत्याशियों को लगभग सभी दलों ने टिकट दिया है , जिनका नाम लेना यहाँ उचित नही है ।अब यह जनता का दायित्व है की देश और समाज हित में सभी दागी प्रत्याशियों को दलगत सोच से ऊपर उठ कर पराजित करना है और इसी तरह हमेशा ऐसे दागियों को तब तक चुनावों में पराजित करते रहना होगा जब तक कि इनके हौसले पस्त न हो जाए ,और दागी उम्मीदवार दोबारा फिर चुनाव लड़ने की हिम्मत न जुटा सके।
लोकतंत्र में नागरिको को वोट करने का अधिकार प्राप्त है, जिसका प्रयोग परिवर्तन के लिए आपको एकजुट होकर जातिवाद,संकीर्णता,धार्मिक भावना से हटकर मताधिकार का प्रयोग करना है ,इस हेतु आइये हम सब संकल्प ले कि किसी भी दशा में हम अपने मताधिकार का प्रयोग कर नए समाज के गठन में और देश की संवृद्धि में अपना योगदान करेंगे ।
जयहिंद - जय भारत ।
लोकतंत्र में नागरिको को वोट करने का अधिकार प्राप्त है, जिसका प्रयोग परिवर्तन के लिए आपको एकजुट होकर जातिवाद,संकीर्णता,धार्मिक भावना से हटकर मताधिकार का प्रयोग करना है ,इस हेतु आइये हम सब संकल्प ले कि किसी भी दशा में हम अपने मताधिकार का प्रयोग कर नए समाज के गठन में और देश की संवृद्धि में अपना योगदान करेंगे ।
जयहिंद - जय भारत ।
Thursday, April 2, 2009
भारतीय लोकतंत्र के परीक्षा की घड़ी-06
इस माह से प्रारम्भ होने वाले १५ वी लोक सभा के निर्वाचन बड़े ही कठिन समय पर है, जब देश विशवास के संकट के दौर से गुजर रहा है ,हर तरफ़ झूठ,अन्याय,भ्रष्टचार ,अनीति,शोषण,अधर्म का बोलबाला है। राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं गौरव जैसे शब्दों का सर्वथा अभाव देखने सुनने को नही मिलते है,ऐसे मौके पर देश की आम जनता के समक्ष बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लेने की जिम्मेदारी है ,जिसे सबको बहुत सोच समझ कर अंजाम देना है । प्रत्येक राजनीतिक दलों द्वारा अपनी अपनी बिसात बिछाई जा रही है । कई दलों के नेताओं ने तो यह सार्वजानिक सभाओं में खुलकर कहना शुरू कर दिया है कि उनके सहयोग के बिना देश में अगली सरकार किसी भी दशा में बनाईं नही जा सकती है और हुंकार भर रहे हैं कि जैसे उनके जैसी जातिवादी सोच जनता की है ,और जनता के वोट उन्ही की झोली में हर हाल में होगा ,कुछ दलों के नेता तो ऐसे है जिन्होंने ५ वर्ष तक सत्ता का आनंद लेने के बाद नेतृत्व करने वाले दल के विरुद्ध अलग मोर्चा बना लिया है ,इनमे श्री लालू यादव तथा श्री राम विलास पासवान ने श्री मुलायम सिंह यादव के साथ मोर्चा बना कर उत्तर प्रदेश और बिहार में सं० प्र०ग० के नेतृत्व करने वाले कांग्रेस को ललकार दिया है । इसी तरह कल तक सत्ता का भोग करने वाले तमिलनाडु के पी०यम० के० ने श्रीलंका में तमिलों पर हो रहे अत्याचार के कारण तमिलनाडु की बदली परिस्थिति में द्र०मु०क०,कांग्रेस गठबंधन को छोड़कर सुश्री जयललिता के नेतृत्व वाले गठबंधन में सम्मिलित हो गए परन्तु उनके मंत्रियों में कुछ नैतिकता थी और उन्होंने मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया किंतु श्री लालू प्रसाद यादव और श्री राम विलास पासवान ने मंत्रीमंडल से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देना भी उचित नही समझा और उसपर यह धींगामुश्ती कि आगे जरूरत पड़ने पर वह फिर कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनायेंगे यह कहने से भी बाज नही आए। अब बिहार की जनता का यह दायित्व है कि ऐसे नेताओं को जो खुलेआम अपने मुखौटे के उतार चुके हैं उन्हें सही सीख दे ,इनके किसी झासे में ने आए । इसी तरह श्री मुलायम सिंह यादव द्वारा परमाणु समझौते के बाद से अब तक सं०प्र०ग० सरकार को समर्थन देते रहे अब दोनों ने एक दूसरे को धरती दिखने की सोच कर एक दूसरे के आमने सामने खड़े हैं । जनता को अब क्षेत्रीय राजनितिक दलों की वास्तविकता का पूरी तरह से खुलासा हो चुका है कि इन दलों का राष्ट्रीय राजनीती में केवल इनका महत्त्व निजी स्वार्थ है । देश के विकास के बजाय इनका उद्देश्य केवल किसी प्रकार सत्ता हासिल कर शक्ति और लूट खसोट कर करना है ,श्री मुलायम सिंह राजनीती में १९६७ में विधायक बनकर अस्तित्व में आए अब उनके और उनके परिवार के पास करोड़ों की सम्पत्ति है,इसी तरह श्री लालू प्रसाद यादव और श्री राम विलास पासवान १९७७ से संसद चुनकर आए और अब करोड़ों की सम्पत्ति के स्वामी है ,मैं पूछता हूँ देश में इन जैसे राजनीतिज्ञों और पूंजीपतियों के अतिरिक्त देश के कितने नागरिकों का आर्थिक विकास इनलोगों की तरह हुआ । स्पष्ट है इनके द्वारा अर्जित समस्त सम्पत्ति जनता की गाढी कमी से लूटी दौलत है । अब जनता को इनके सभी अबतक किए कारनामों को ध्यान में रखकर फैसला करने का समय आगया।
इन क्षेत्रीय दलों का न तो कोई सिद्धांत है और न ही इनका कोई घोषणा पत्र ही होता है,प्राय: ये दल किसी एक नेता की जेबी संस्था की तरह होती है,इनके दलों में परी के अन्दर किसी तरह का लोकतंत्र नही होता। एक प्रकार से इन दलों में व्यक्ति विशेष की तानाशाही होती है,इन दलों का गठन ही केवल व्यक्तिगत महत्वकान्षा की पूर्ति के लिए होता है । मेरा निवेदन है की जनता ऐसे दलों को वोट देने के पहले इनके कारनामों के अवश्य याद करले।
राष्ट्रीय पार्टियों के घोषणा पत्र चुनाव के पहले जारी किए जाते हैं जिसमे सामान्य रूप से पार्टी को सत्ता में आने के बाद सिद्धांत रूप में घोषणा पत्र के वादों के मुताबिक इनको कार्य करना होता है । किंतु अभी तक घोषणा पत्र में केवल लोक लुभावने वादे किए जाते हैं जैसे भा०ज०पा० ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में अयोध्या में राम मन्दिर बनाने ,काश्मीर में धारा- ३७० के हटाये जाने , राम सेतु के मामले जैसे हिंदुत्व के मुद्दों को फिर उठाया है ,जबकि ये सभी घोषणा उनके द्वारा १९९९ के चुनाव में भी किया था परन्तु सरकार गठन के बाद राम जन्म भूमि पर मन्दिर का निर्माण और धारा -३७० जैसे मुद्दों को पार्टी ने रा०ज० ग० के एजेंडा में शामिल नही किया अब पुन: इनके फिर से घोषित करने का क्या तात्पर्य है ,इसके बारे में समझना होगा। देश का विभाजन दोबारा न हो इस बात को हमेशा ध्यान में रखते हुए शांन्तिपूर्ण तरीके से मसले को हल करने के लिए दूसरे सम्प्रदाय के लोगों से सहमति बना कर इन सभी का हल करना होगा ।भा० ज ० पा० ने अपने घोषणा पत्र में समाज के सभी वर्गों के लिए अनेक लुभावने वादे किए हैं जिसमे गरीबों के लिए,किसानो के लिए ,बालिकाओं आदि सभी के लिए कुछ न कुछ घोषित किया गया है,देखना होगा कि इनके सत्ता में आने पर पार्टी क्या करती है ,किंतु इनके पिछले ६ वर्षों के कार्य काल में इनके गठबंधन की सरकार ने अवश्य राम मन्दिर आदि मुद्दों को जिसे पार्टी ने ख़ुद स्थगित कर दिया था के अतिरिक्त देश को परमाणु शक्ति के देशों में सम्मिलित करने का साहस पूर्ण कार्य ,देश की अर्थ व्यवस्था में अभूतपूर्व विकास,विश्व में भारतीय सम्मान में वृद्धि का कार्य करने का श्रेय अवश्य है ,किंतु फिर से इस दल को पुन: लोगों में अपना विश्वास जताने के लिए कठोर प्रयास करना होगा, राजनितिक दलों में गुटबाजी एक प्रकार से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का अंश होता है,इससे किसी राजनितिक से जनता को परहेज करने की आवश्यकता नही है ,जिस दल में गुटबंदी न हो तो यह समझ लेना चाहिए कि उस दल में लोकतंत्र नही है ,जहाँ नेतृत्व की आलोचना का सामर्थ्य आम कार्यकर्ता में न हो उस दल में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव होता है और ऐसे दल की वास्तव में लोकतंत्र में आस्था नही होती है । जनता को छद्म लोकतान्त्रिक दलों से भी सावधान रहना चाहिए ।
अब वर्तमान में सत्ता में स्थापित कांग्रेस पार्टी की चर्चा करना चाहूँगा ,यह दल देश का सबसे पुराना और स्थापित दल है ,जिसका नेतृत्व प्राय: किसी एक चोटी के नेता के पास रहता आया है और पूरी पार्टी का केन्द्र वही नेता होता था यह परम्परा अब भी वर्तमान में है। आज़ादी के बाद १९६४ तक श्री जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में था ,उनके बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी क्रमश: श्री राजीव गाँधी और वर्तमान में श्री राजीव गाँधी की पत्नी श्रीमती सोनिया गाँधी तथा आगे आने वाले समय में श्री राहुल गाँधी को नेतृत्व मिलना प्राय: निश्चित है । इस दल ने देश पर कुल ११ वर्षों को छोड़कर प्राय: एक छत्र शासन किया । दल का इतिहास हम सभी जानते है पार्टी के विषय में बताना सूरज को रोशनी दिखाने जैसी बात है । फिर भी चर्चा के लिए पार्टी के घोषणा पत्र का उल्लेख करना उचित होगा ,कांग्रेस पार्टी का तो वही २००४ का एजेंडा है ,चूँकि उनकी सरकार ने ५ वर्ष सरकार चलाई है जिसके परिणाम स्वरुप महगाई अपने चरम सीमा पर है,देश में आतंकवादी गतिविधियाँ अपने चरम पर है,बेरोजगारी की समस्या बढ़ती जा रही है ,किसानों द्वारा विदर्भ,आन्ध्र प्रदेश में किसानो द्वारा आत्महत्या के मामलों में किसी तरह की कमी नही आई ,जिसे लेकर २००४ का चुनाव में उनके द्वारा मुद्दा बनाया गया था । २००४ के चुनाव में महिला आरक्षण को भी मुद्दा बनाया था किंतु ५ साल बाद भी देश की महिलाओं को सामान अधिकार की बात तो दूर उन्हें ३३% आरक्षण भी नही दे पाई, यह उनकी असफलता है जिसका पार्टी को जवाब देना होगा ।किंतु ऐसा भी नही की पार्टी ने इस अवधि कुछ भी नही किया पार्टी की सरकार ने नरेगा के मध्यम से ग्रामीणों को रोजगार का अवसर देने का काम शुरू किया जो अच्छी योजना है ,यह बात और है की योजना नेताओं और नौकरशाही के मुह का निवाला बन गई ,पर योजना बहुत अच्छी है ,आगे योजना से आम ग्रामीण को अवश्य लाभ मिलेगा । यदि कांग्रेस नेतृत्त्व की सरकार के पिछले पाँच वर्ष 2००४ से २००९ तक और १९९९ से २००४ तक की भा०ज० पा० के नेतृत्त्व की सरकार के ५ वर्ष के कार्य काल की उपलब्धियों की दृष्टि से तुलना करने पर भा०जा०पा० के नेतृत्त्व के सरकार ने तुलनात्मक दृष्टि से ज्यादा अच्छा काम किया । किंतु अन्तर श्री अटल बिहारी वाजपेयी , श्री लाल कृष्ण अडवानी और श्री मनमोहन सिंह के बीच का है । श्री अटल बिहारी वाजपेयी एक बहुत अनुभवी राजनेता थे जिनका व्यक्तित्व चुम्बकीय था और वह एक उच्च कोटि के कूटनीतिज्ञ भी थे जिनका अन्तरराष्ट्रीय जगत में एक विशिष्ट स्थान था ,उनकी तुलना में श्री मनमोहन सिंह किस स्थान पर आते हैं, इसके बारे में हमें स्वयम तय करना होगा ,श्री मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी के भी सर्वोच्च नेता भी नही है ,पार्टी के शीर्ष पर श्रीमती सोनिया गाँधी हैं ।भारतीय संविधान में प्रधान मंत्री का स्थान एक विशिष्ट बनाया गया था जो देश और सदन दोनों का नेता होता है ,श्री मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्री रहते हुए इस अति महत्त्व पूर्ण पद की गरिमा में ह्रास हुआ ।जिसके कारणों के की परख करने पर यह पता चलता है कि यदि किसी एक दल का बहुमत होने कि दशा में पार्टी नेतृत्त्व अपने श्रेष्ठ नेता को इस पद पर चुनाव करती जिसे देश तथा लोक सभा दोनों का पूर्ण वास्तविक विश्वास होता,मैं चाहूँगा कि यदि कांग्रेस पार्टी फिर सत्ता में आए तो प्रधान मंत्री के पद पर स्वयं श्रीमती सोनिया गाँधी आसीन हो ,क्योकि जनता उनके नेतृत्त्व गुणों कि कायल होगई है । छद्म नेतृत्त्व के बजाय वे स्वयं अपने हाथ में सत्ता की कमान ले ।
उपर्युक्त तथ्यों के बाद मेरी आप सब से विनती है की कृपया केवल राष्ट्रीय दलों को अपना कीमती मत देने का कष्ट करे।
इन क्षेत्रीय दलों का न तो कोई सिद्धांत है और न ही इनका कोई घोषणा पत्र ही होता है,प्राय: ये दल किसी एक नेता की जेबी संस्था की तरह होती है,इनके दलों में परी के अन्दर किसी तरह का लोकतंत्र नही होता। एक प्रकार से इन दलों में व्यक्ति विशेष की तानाशाही होती है,इन दलों का गठन ही केवल व्यक्तिगत महत्वकान्षा की पूर्ति के लिए होता है । मेरा निवेदन है की जनता ऐसे दलों को वोट देने के पहले इनके कारनामों के अवश्य याद करले।
राष्ट्रीय पार्टियों के घोषणा पत्र चुनाव के पहले जारी किए जाते हैं जिसमे सामान्य रूप से पार्टी को सत्ता में आने के बाद सिद्धांत रूप में घोषणा पत्र के वादों के मुताबिक इनको कार्य करना होता है । किंतु अभी तक घोषणा पत्र में केवल लोक लुभावने वादे किए जाते हैं जैसे भा०ज०पा० ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में अयोध्या में राम मन्दिर बनाने ,काश्मीर में धारा- ३७० के हटाये जाने , राम सेतु के मामले जैसे हिंदुत्व के मुद्दों को फिर उठाया है ,जबकि ये सभी घोषणा उनके द्वारा १९९९ के चुनाव में भी किया था परन्तु सरकार गठन के बाद राम जन्म भूमि पर मन्दिर का निर्माण और धारा -३७० जैसे मुद्दों को पार्टी ने रा०ज० ग० के एजेंडा में शामिल नही किया अब पुन: इनके फिर से घोषित करने का क्या तात्पर्य है ,इसके बारे में समझना होगा। देश का विभाजन दोबारा न हो इस बात को हमेशा ध्यान में रखते हुए शांन्तिपूर्ण तरीके से मसले को हल करने के लिए दूसरे सम्प्रदाय के लोगों से सहमति बना कर इन सभी का हल करना होगा ।भा० ज ० पा० ने अपने घोषणा पत्र में समाज के सभी वर्गों के लिए अनेक लुभावने वादे किए हैं जिसमे गरीबों के लिए,किसानो के लिए ,बालिकाओं आदि सभी के लिए कुछ न कुछ घोषित किया गया है,देखना होगा कि इनके सत्ता में आने पर पार्टी क्या करती है ,किंतु इनके पिछले ६ वर्षों के कार्य काल में इनके गठबंधन की सरकार ने अवश्य राम मन्दिर आदि मुद्दों को जिसे पार्टी ने ख़ुद स्थगित कर दिया था के अतिरिक्त देश को परमाणु शक्ति के देशों में सम्मिलित करने का साहस पूर्ण कार्य ,देश की अर्थ व्यवस्था में अभूतपूर्व विकास,विश्व में भारतीय सम्मान में वृद्धि का कार्य करने का श्रेय अवश्य है ,किंतु फिर से इस दल को पुन: लोगों में अपना विश्वास जताने के लिए कठोर प्रयास करना होगा, राजनितिक दलों में गुटबाजी एक प्रकार से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का अंश होता है,इससे किसी राजनितिक से जनता को परहेज करने की आवश्यकता नही है ,जिस दल में गुटबंदी न हो तो यह समझ लेना चाहिए कि उस दल में लोकतंत्र नही है ,जहाँ नेतृत्व की आलोचना का सामर्थ्य आम कार्यकर्ता में न हो उस दल में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव होता है और ऐसे दल की वास्तव में लोकतंत्र में आस्था नही होती है । जनता को छद्म लोकतान्त्रिक दलों से भी सावधान रहना चाहिए ।
अब वर्तमान में सत्ता में स्थापित कांग्रेस पार्टी की चर्चा करना चाहूँगा ,यह दल देश का सबसे पुराना और स्थापित दल है ,जिसका नेतृत्व प्राय: किसी एक चोटी के नेता के पास रहता आया है और पूरी पार्टी का केन्द्र वही नेता होता था यह परम्परा अब भी वर्तमान में है। आज़ादी के बाद १९६४ तक श्री जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में था ,उनके बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी क्रमश: श्री राजीव गाँधी और वर्तमान में श्री राजीव गाँधी की पत्नी श्रीमती सोनिया गाँधी तथा आगे आने वाले समय में श्री राहुल गाँधी को नेतृत्व मिलना प्राय: निश्चित है । इस दल ने देश पर कुल ११ वर्षों को छोड़कर प्राय: एक छत्र शासन किया । दल का इतिहास हम सभी जानते है पार्टी के विषय में बताना सूरज को रोशनी दिखाने जैसी बात है । फिर भी चर्चा के लिए पार्टी के घोषणा पत्र का उल्लेख करना उचित होगा ,कांग्रेस पार्टी का तो वही २००४ का एजेंडा है ,चूँकि उनकी सरकार ने ५ वर्ष सरकार चलाई है जिसके परिणाम स्वरुप महगाई अपने चरम सीमा पर है,देश में आतंकवादी गतिविधियाँ अपने चरम पर है,बेरोजगारी की समस्या बढ़ती जा रही है ,किसानों द्वारा विदर्भ,आन्ध्र प्रदेश में किसानो द्वारा आत्महत्या के मामलों में किसी तरह की कमी नही आई ,जिसे लेकर २००४ का चुनाव में उनके द्वारा मुद्दा बनाया गया था । २००४ के चुनाव में महिला आरक्षण को भी मुद्दा बनाया था किंतु ५ साल बाद भी देश की महिलाओं को सामान अधिकार की बात तो दूर उन्हें ३३% आरक्षण भी नही दे पाई, यह उनकी असफलता है जिसका पार्टी को जवाब देना होगा ।किंतु ऐसा भी नही की पार्टी ने इस अवधि कुछ भी नही किया पार्टी की सरकार ने नरेगा के मध्यम से ग्रामीणों को रोजगार का अवसर देने का काम शुरू किया जो अच्छी योजना है ,यह बात और है की योजना नेताओं और नौकरशाही के मुह का निवाला बन गई ,पर योजना बहुत अच्छी है ,आगे योजना से आम ग्रामीण को अवश्य लाभ मिलेगा । यदि कांग्रेस नेतृत्त्व की सरकार के पिछले पाँच वर्ष 2००४ से २००९ तक और १९९९ से २००४ तक की भा०ज० पा० के नेतृत्त्व की सरकार के ५ वर्ष के कार्य काल की उपलब्धियों की दृष्टि से तुलना करने पर भा०जा०पा० के नेतृत्त्व के सरकार ने तुलनात्मक दृष्टि से ज्यादा अच्छा काम किया । किंतु अन्तर श्री अटल बिहारी वाजपेयी , श्री लाल कृष्ण अडवानी और श्री मनमोहन सिंह के बीच का है । श्री अटल बिहारी वाजपेयी एक बहुत अनुभवी राजनेता थे जिनका व्यक्तित्व चुम्बकीय था और वह एक उच्च कोटि के कूटनीतिज्ञ भी थे जिनका अन्तरराष्ट्रीय जगत में एक विशिष्ट स्थान था ,उनकी तुलना में श्री मनमोहन सिंह किस स्थान पर आते हैं, इसके बारे में हमें स्वयम तय करना होगा ,श्री मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी के भी सर्वोच्च नेता भी नही है ,पार्टी के शीर्ष पर श्रीमती सोनिया गाँधी हैं ।भारतीय संविधान में प्रधान मंत्री का स्थान एक विशिष्ट बनाया गया था जो देश और सदन दोनों का नेता होता है ,श्री मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्री रहते हुए इस अति महत्त्व पूर्ण पद की गरिमा में ह्रास हुआ ।जिसके कारणों के की परख करने पर यह पता चलता है कि यदि किसी एक दल का बहुमत होने कि दशा में पार्टी नेतृत्त्व अपने श्रेष्ठ नेता को इस पद पर चुनाव करती जिसे देश तथा लोक सभा दोनों का पूर्ण वास्तविक विश्वास होता,मैं चाहूँगा कि यदि कांग्रेस पार्टी फिर सत्ता में आए तो प्रधान मंत्री के पद पर स्वयं श्रीमती सोनिया गाँधी आसीन हो ,क्योकि जनता उनके नेतृत्त्व गुणों कि कायल होगई है । छद्म नेतृत्त्व के बजाय वे स्वयं अपने हाथ में सत्ता की कमान ले ।
उपर्युक्त तथ्यों के बाद मेरी आप सब से विनती है की कृपया केवल राष्ट्रीय दलों को अपना कीमती मत देने का कष्ट करे।
Wednesday, April 1, 2009
भारतीय लोकतंत्र के परीक्षा की घड़ी -05
मैं कई दिनों से इस बात को सोच - सोच कर बहुत परेशां था की मैं क्यो देश की लोक्तान्रिक व्यवस्था को लेकर इतनी गहरी चिंता में हूँ । बाद में यह उत्तर मिला कि शायद ये मेरा भ्रम है कि देश को आने वाले वर्षों में इस चुनाव के परिणाम से कुछ लाभ होगा ,इसलिए मैंने अपने विचार व्यक्त करने की सोच कर जन जागरण का प्रयास शुरू किया ,किंतु मैं गलत था,इस देश में निवास करने वाले लोग हजारों वर्षों से यथास्थिति वादी रहे हैं ,कोई भी शासक हो उन्हें किसी की परवाह नही रही,इस बात का साक्षी स्वयम इतिहास भी है । शक ,हूण,कुषाण, यवन अफगानी,मुगल और अंत में अँगरेज़ आए पर इस देश के लोगों ने सभी को आत्मसात कर लिया और उनकी कतई परवाह नही किया । यह देश जैसा पहले था वैसा ही है और आगे भी रहेगा। हम सब लोग ईश्वरवादी हैं ,जैसी ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा।हमें उसके लिए परेशान नही होना चाहिए । लेकिन फिर यह सोच आयी कि एक नागरिक होने के नाते मेरा व्यक्तिगत मत है कि जैसा भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा हैं कि "कर्मणे वा धिकारस्ते माँ फलेषु कदाचान "अर्थात कर्म बिना फल की चिंता करते हुए करना चाहिए ,इसी वाक्य को ध्यान में रखकर अपने कर्तव्य और धर्म का पालन कर रहा हूँ ।
मेरे कई मित्रों ने मेरे लेखन पर किसी खास राजनितिक विचारधारा का पक्षकार होने का आरोप लगाते हुए कई पुराने पोस्ट में लिखी बातों पर अपनी आपत्ति जताई इनमे मुख्य रूप से विमान अपहरण काण्ड पर श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा आतंकवादियों को छोड़े जाने के निर्णय के सम्बन्ध में मेरे विचारो को अनुचित बताया गया परन्तु मैं अपने पूर्व में व्यक्त विचार पर किसी प्रकार की कोई क्षमा याचना नही कर रहा हूँ क्योकि मात्र इस बात से कि आगे चलकर छोड गए आतंकी बाद में और बड़ी हानि देश वासियों को पंहुचा सकते हैं इसलिए विमान के अन्दर बंधक बने यात्रिओं को जिन्हें अपहरण कर कंधार ले जाया गया था जहाँ आतंकवादियों ने एक यात्री की हत्या की और तब उनके द्वारा दो आतंकी जो उस समय भारत में जेल में थे ,को छोड़ने की शर्त पर हवाई जहाज के बंधकों को छोड़ने की सरकार के समक्ष अफगानी विदेश मंत्री के माध्यम से रखा था, उस समय अफगानिस्तान तालिबानी शासक मुल्ला उमर के नियंत्रण में था ,जो पाकिस्तान के पूर्ण समर्थन में था,जहाँ हम आक्रमण भी नही कर सकते थे ,ऐसे हालत में अपने सैकड़ों हमवतनों को कंधार में बेमौत मरने के लिए छोड़ देना किसी भी नजरिये से उचित नही था,परिस्थिति विशेष में सरकार को आतंकवादियों की मांग पूरी करनी पड़ी ।मुंबई के आतंकी हमले में जिस प्रकार कि कार्यवाही आज कि सरकार कर सकी उसका कारण घटना का देश में होना था ,जिसके लिए वर्तमान सरकार ख़ुद की पीठ थाप थापा रही है परन्तु घटना के समय गृह मंत्री श्री शिवराज पाटिल और अब्दुल रहमान अंतुले के द्वारा जारी बयान के प्रधान मनरी श्री मन मोहन सिंह अथवा सं०प्र० ग० की चेयर पर्सन सोनिया जी के पास कोई उत्तर है ,मैं अपने मित्रों से पूछना चाहता हूँ कि कितने देश इस्राइल जैसे हैं जिन्होंने विदेशी ज़मीन से आतंकियों के चंगुल में आए देशवासियों को छुडा कर वापस ले जा सके हैं।पूरे विश्व में इस्राइल ने अकेला उदहारण पेश किया था। यदि आज वर्तमान नेतृत्त्व में आतंकवाद से लड़ने की सचमुच इच्छा शक्ति हैं तब उन्हें सीमापार के आतंकी ठिकानो पर सीधे आक्रमण कर आतंकियों के ट्रेनिग कैम्पों तबाह कर उनकी जड़े साफ कर देना चाहिए था, किन कारणों से अबतक इन आतंकी कैम्पों को छोड़ रखा गया है । मेरी राय में हजारो कि जान इसलिए जाने दे कि आगे कोई बड़ा खतरा हो सकता है ,केवल इस संभावना पर सरकार निर्णय नही लेती है । इसलिए मेरा निवेदन है कि कृपया मेरे द्वारा व्यक्त विचारों को समझने का प्रयास करे । जहाँ तक किसी एक विचारधारा कि तरफ़ झुकाव की बात हैं मैं मानता हूँ कि बचपन से ५७ - ५८ वर्षों तक जिस वातावरण और परिवेश में व्यक्ति रहता है उसका कुछ न कुछ प्रभाव उसके विचारों पर अवश्य पड़ता है किंतु मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि मैंने जो कुछ भी लिखा वह किसी पार्टी की विचारधारा या उसका प्रचार के लिए था ,इससे आश्वस्त रहे।
कृपया अपने विचार अवश्य ब्लॉग पर लिखने का कष्ट करें।
मेरे कई मित्रों ने मेरे लेखन पर किसी खास राजनितिक विचारधारा का पक्षकार होने का आरोप लगाते हुए कई पुराने पोस्ट में लिखी बातों पर अपनी आपत्ति जताई इनमे मुख्य रूप से विमान अपहरण काण्ड पर श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा आतंकवादियों को छोड़े जाने के निर्णय के सम्बन्ध में मेरे विचारो को अनुचित बताया गया परन्तु मैं अपने पूर्व में व्यक्त विचार पर किसी प्रकार की कोई क्षमा याचना नही कर रहा हूँ क्योकि मात्र इस बात से कि आगे चलकर छोड गए आतंकी बाद में और बड़ी हानि देश वासियों को पंहुचा सकते हैं इसलिए विमान के अन्दर बंधक बने यात्रिओं को जिन्हें अपहरण कर कंधार ले जाया गया था जहाँ आतंकवादियों ने एक यात्री की हत्या की और तब उनके द्वारा दो आतंकी जो उस समय भारत में जेल में थे ,को छोड़ने की शर्त पर हवाई जहाज के बंधकों को छोड़ने की सरकार के समक्ष अफगानी विदेश मंत्री के माध्यम से रखा था, उस समय अफगानिस्तान तालिबानी शासक मुल्ला उमर के नियंत्रण में था ,जो पाकिस्तान के पूर्ण समर्थन में था,जहाँ हम आक्रमण भी नही कर सकते थे ,ऐसे हालत में अपने सैकड़ों हमवतनों को कंधार में बेमौत मरने के लिए छोड़ देना किसी भी नजरिये से उचित नही था,परिस्थिति विशेष में सरकार को आतंकवादियों की मांग पूरी करनी पड़ी ।मुंबई के आतंकी हमले में जिस प्रकार कि कार्यवाही आज कि सरकार कर सकी उसका कारण घटना का देश में होना था ,जिसके लिए वर्तमान सरकार ख़ुद की पीठ थाप थापा रही है परन्तु घटना के समय गृह मंत्री श्री शिवराज पाटिल और अब्दुल रहमान अंतुले के द्वारा जारी बयान के प्रधान मनरी श्री मन मोहन सिंह अथवा सं०प्र० ग० की चेयर पर्सन सोनिया जी के पास कोई उत्तर है ,मैं अपने मित्रों से पूछना चाहता हूँ कि कितने देश इस्राइल जैसे हैं जिन्होंने विदेशी ज़मीन से आतंकियों के चंगुल में आए देशवासियों को छुडा कर वापस ले जा सके हैं।पूरे विश्व में इस्राइल ने अकेला उदहारण पेश किया था। यदि आज वर्तमान नेतृत्त्व में आतंकवाद से लड़ने की सचमुच इच्छा शक्ति हैं तब उन्हें सीमापार के आतंकी ठिकानो पर सीधे आक्रमण कर आतंकियों के ट्रेनिग कैम्पों तबाह कर उनकी जड़े साफ कर देना चाहिए था, किन कारणों से अबतक इन आतंकी कैम्पों को छोड़ रखा गया है । मेरी राय में हजारो कि जान इसलिए जाने दे कि आगे कोई बड़ा खतरा हो सकता है ,केवल इस संभावना पर सरकार निर्णय नही लेती है । इसलिए मेरा निवेदन है कि कृपया मेरे द्वारा व्यक्त विचारों को समझने का प्रयास करे । जहाँ तक किसी एक विचारधारा कि तरफ़ झुकाव की बात हैं मैं मानता हूँ कि बचपन से ५७ - ५८ वर्षों तक जिस वातावरण और परिवेश में व्यक्ति रहता है उसका कुछ न कुछ प्रभाव उसके विचारों पर अवश्य पड़ता है किंतु मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि मैंने जो कुछ भी लिखा वह किसी पार्टी की विचारधारा या उसका प्रचार के लिए था ,इससे आश्वस्त रहे।
कृपया अपने विचार अवश्य ब्लॉग पर लिखने का कष्ट करें।
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